सारी सृष्टि दुल्हन सी सजी है

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सारी सृष्टि दुल्हन सी सजी है

सारी सृष्टि दुल्हन सी सजी है
क्या अनोखी ये कारीगरी है
आग सूरज में जो जल रही है
क्या गजब है कि बुझती नहीं है
चाँद में ठण्डी सी चान्दनी है
क्या अनोखी ये कारीगरी है
सारी सृष्टि दुल्हन सी सजी है
क्या अनोखी ये कारीगरी है

ठण्डी – ठण्डी जो चलती हवायें
साथ लेकर के काली घटायें
इन घटाओं के संग दामिनी है
क्या अनोखी ये कारीगरी है
सारी सृष्टि दुल्हन सी सजी है
क्या अनोखी ये कारीगरी है

भान्ति – भान्ति की कलियाँ चमन में
कैसी भर दी है खुशबू सुमन में
साड़ी तितली की कैसी रँगी है
क्या अनोखी ये कारीगरी है
सारी सृष्टि दुल्हन सी सजी है
क्या अनोखी ये कारीगरी है

भागी नदियाँ चली जा रही हैं
किससे मिलने को अकुला रही हैं
हमने “बेमोल” समझी नहीं हैं
क्या अनोखी ये कारीगरी है
सारी सृष्टि दुल्हन सी सजी है
क्या अनोखी ये कारीगरी है

रचनाकार :- श्री लक्ष्मणसिंह “बेमोल”
स्वर :- पण्डित श्री योगेश दत्त जी