स्व-प्रकाश स्वरूप ईश्वर तेरा अभिनन्दन करें
ज्ञान स्वरूप जगत के स्वामी कर्म उत्तम हम करें ॥
हों सदाचारी, हृदय में प्रेम भाव सदा भरें
प्राणीमात्र से प्रेम करके तेरे चरणों में रहें
बुद्धि हो पावन हमारी मन को निर्मल हम करें ॥
ज्ञान और विज्ञान से ऐश्वर्यवान सम्पन्न रहें
जो मिला ऐश्वर्य धर्म के हित सदा अर्पण करें
त्याग के कल्याण पथ पर अग्रसर जीवन करें ॥
कुटिल कर्मों से प्रभुजी दूर हमको किया करें
वासना विषयों के जाल से छूटें ऐसी दया करें
कमल के पत्ते पड़ी उस बूँद सा जीवन करें ॥
प्रार्थना स्तुति और उपासना तेरी भक्ति हम करें
आत्मर्शन करके आनन्द में सदा प्रभु हम रहें
भाव सात्विक उपजे मन में, ऐसा तन्मय मन करें ॥
(स्वप्रकाश) स्वयं प्रकाशित (कुटिल) बुरा, टेढ़ा (तन्मय) दत्तचित्त










