हे सोम प्रभु ! किसलिए तुम्हें ब्रह्मत्व का रक्षक कहते हैं ?
हे सोम प्रभु ! किसलिए तुम्हें
ब्रह्मत्व का रक्षक कहते हैं ?
हे प्रिय किसलिए तुम्हें हमारा अभिशस्ति से
या लोक निन्दा से रक्षा करने वाला कहते हैं ?
हे भद्र ! क्यों हमें निन्दा का विषय
बने हुए देख रहे हो ?
ब्रह्मविरोधी पर सन्तापक वज्र को फेंको |
हे मेरे प्रभुवर ! तुम सोम हो, चन्द्र हो,
सद्विचार-समुद्र में लहरों के समान
आगे बढ़ाने वाले तथा दुर्भाव तिमिर को,
अन्धकार को नष्ट करने वाले हो |
बुद्धिमान, मनीषी लोग पुकार पुकार के
कह रहे हैं कि तुम “ब्रह्म” के रक्षक हो
अर्थात् ब्रह्म शब्द वाच्य सत्य, ज्ञान, विवेक,
सत्कर्म, सदाचार, धर्म, आस्तिकता, बृहता
(महानता) उदारता, उत्कर्ष आदि विभूतियों की
या ऐश्वर्यों की रक्षा करने वाले हो |
हे भगवान् ! तुम्हारे बारे में कहा जाता है कि
जब कभी सत्य और धर्म पर कष्ट या
आपत्ति आती है तब तुम ही उसकी रक्षा
करते हो पर यही प्रशस्ति या प्रशंसा हमारे
विषय में चरितार्थ क्यों नहीं हो रही ?
तुम्हारे स्तुति-गीत गाते हुए तुम्हारे भक्त
सदा दुहाई देते हैं कि तुम अभिशास्ति से,
लोक निन्दा से दुर्भाग्य विपत्ति, अनिष्ट, हिंसा,
अभिशाप, अपयश आदि से छुड़ाने वाले हो,
पार लगाने वाले हो पर तुम हमारी
दर्द भरी पुकार को क्यों नहीं सुनते ?
देखो आज हमारे लोगों की,
हमारे समाज की, हमारे देश की
हमारे विश्व कुटुम्ब की क्या दशा हो रही है |
पहले कभी हमारा वेश सब गुण-गरिमा या
महामहिमाओं से अलंकृत था, सजा हुआ था |
कभी अश्वपति कैकय जैसे राजा घोषणा
करते थे कि हमारे देश में ना कोई चोर,
कंजूस या शराबी है न हवन
ना करने वाला कोई है,
न मूर्ख है ना अपराध करने वाला कोई है
लेकिन आज दशा बिल्कुल उलटी है |
राक्षस भोली प्रजा को लूट रहे हैं व्यापार में चोरी,
मिलावट हो रही है, सत्य छिप गया है,
अज्ञान बढ़ रहा है,
अभिशाप हम पर गिर रहा है |
हे सोम प्रभु ! यह सब देखकर भी
आप चुप क्यों हो, हमसे मुँह न फेरो,
जो हमारे देश में ब्रह्मविरोधी पनप रहे हैं
उन्हें अपने वज्र प्रहार से निर्मूल कर दो |










