मेरा देश है प्राणों से प्यारा

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मेरा देश है प्राणों से प्यारा

मेरा देश है प्राणों से प्यारा,
संसार के देशों से न्यारा।
मेरे देश को दुनियां जानती है,
गुरु आज तलक भी मानती है।
उत्तर में हिमालय चूमे गगन,
योगी जहाँ बैठे लगा लगन।
गंगा ब्रह्मपुत्रा और यमुन,
धरती के छूती चले चरण ॥


है मान सरोवर झील कहां,
मोती चुगते हैं हंस जहाँ।
जहाँ गलकर हिम बनता धारा,
चान्दी सा लगता चमकारा ॥1॥

कहीं ज्वालामुखी उगले अंगार,
सागर में आता उमड़ ज्वार।
मन हर लेता है नन्दन वन,
सेबों से लदे सुन्दर उपवन॥
है धन्य अजन्ता चित्रकार,
पर्वत है अर्ध चन्द्राकार।
बहती है मुड़कर इठलाती,
बाधुर नदी सर्प सी बल खाती॥


कभी देख एलोरा में जाकर,
कह गये विदेशी भी आकर।
है धन्य इसे सृजन हारा,
आश्चर्य में है जग सारा ॥2॥

हर पग-पग पर है सुन्दरता,
रंग रूप सदा मन को हरता।
माँ कहती है मीठी बोली में,
जब चढ़ती है दुल्हन डोली में।
है लाज तेरे तन का गहना,
अपने पी की बनकर रहना।
वाणी में मिश्री घोलना तू,
ससुराल में जा कम बोलना तू॥


पायल का घूंघरु झनकता है ,
हाथों में कंगना खनकता है।
गाये जा मंगल मोद भरे,
रुन झुन छुन छुन करते नुपरे ॥
घूंघट को सखियाँ सरकायें,
दुल्हन मन ही मन शर्मायें।
बंध बंधनवार सजे द्वारा,
लगता है रमणियों का लारा ॥३॥

छः ऋतुयें बारह मास यहाँ,
सर्दी गर्मी बरसात यहाँ।
सूरज की चमकती जब लाली,
खेतों में बिखरती हरियाली॥
जाते हैं कृषक खलिहानों में,
मचता है शोर मचानों में।
रसिये कहीं आल्हा गाते हैं,
फागुन में गुलाल उड़ाते हैं॥


कहीं बजती है रण की रण भेरी,
सीमा पर मस्त खड़े प्रहरी।
गण लिए हुए हैं हाथों में ,
जागते जो सारी रातों में।।
सैनिक तंग घाटी में चढ़ता,
पत्नी की पाती को पढ़ता।
लिखा साजन बन बेप्रीत गये,
सावन के दिन भी बीत गये ॥


लिखा उत्तर में सजनी भोली,
इस बार संग खेलूं होली।
इतने में लगी आकर गोली,
मिट गयी सुहागन की रोली॥
तन छलनी हुआ गया शोणित बह,
कहा भारत माँ हो तेरी जय।
‘कर्मठ’ घर गया न दोबारा,
जीवन प्रिय देश पै है वारा॥4॥