आजादी की दुल्हन मेरे कफन की चुनरी ओढ़े
आजादी की दुल्हन मेरे
कफन की चुनरी ओढ़े।
आयेगी माँ घर तेरे
दिन रह गये थोड़े॥
मौत बनेगी मेरी दुल्हन,
है अभिशाप गुलामी का बंधन।
रंग लायेगी कुर्बानी माँ हिल
जायेगा ब्रिटिश शासन॥
जन्म दोबारा लेकर के
जंजीर सितम की तोड़े ॥1॥
देश की खातिर मर जायेंगे,
मरकर के फिर भी आयेंगे।
आकर के दुश्मन के
ऊपर बम के गोले बरसायेंगे॥
कसम मादरे हिन्द की
फिरंगी को नहीं जिन्दा छोड़े॥2॥
सच माँ नहीं फांसी का डर है,
नाशवान देह जीव अमर है।
कदम बढ़े पीछे ना हटेंगे
अब तो हथेली के ऊपर सर है॥
हक चाहते हैं भीख नहीं फिर
हाथ किसी को क्यों जोड़े॥3॥
हम इतने अंजान नहीं हैं,
इस जीने में शान नहीं है।
मातृभूमि के ऊपर मरना फर्ज है
ये अहसान नहीं है॥
अब जालिम के नहीं खायेंगे
कर्मठ बंदन पै कोड़े॥4॥










