दृढ़ मज़बूत बना

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(तर्ज- सुनो सुनो ऐ दुनियाँ वालों बापू की यह अमर कहानी)

दृते वृह॒ मा मि॒ित्रस्य॑ मा॒ चक्षुषा सर्वीणि भूतानि समक्षन्ताम् ।
मित्रस्या॒हं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि सर्मीक्षे। मित्रस्य॒ चक्षुषा सर्मीक्षामहे ।
– यजु० ३६।१८

हे अज्ञान विदारक भगवन् मुझ को दृढ़ मज़बूत बना।
बल का सद् उपयोग करूँ मैं ऐसा वीर सपूत बना।
हे अज्ञान विदारक भगवन्…………

सब प्राणी मुझ को अपनाएँ इन सब को अपनाऊँ मैं।
मित्र भाव से मुझ को देखें सर्वमित्र बन जाऊँ मैं।
जग में सब के हृदय जीत लूँ मुझे प्रेम का दूत बना।
हे अज्ञान विदारक भगवन्…………

एक लड़ी में करूँ इक्ट्ठे बिखरे मोती माला के।
बिछड़ों को मैं गले लगा दूँ दूर दूर से लाला के।
फिर यह माला कभी न टूटे बीच प्यार का सूत बना।
हे अज्ञान विदारक भगवन्………..

ऊपर नीचे आगे पीछे अपने और पराए भी।
सभी दिशाएँ मित्र बनें और प्यार करें हम साए भी।
वर्तमान के आचरणों से सफल भविष्यत् भूत बना।
हे अज्ञान विदारक भगवन्………..

कोई मुझसे द्वेष करे या मैं औरों से द्वेष करूँ।
द्वेषभाव को प्रभु तुम्हारे न्यायालय में पेश करूँ।
‘पथिक’ किसी से द्वेष न हो मुझ को ऐसा अवधूत बना।
हे अज्ञान विदारक भगवन्…………