दुनियां वालो ! देव दयानन्द दीप जलाने आया था

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दुनियां वालो ! देव दयानन्द दीप जलाने आया था

दुनियां वालो ! देव दयानन्द,
दीप जलाने आया था
भूल चुके थे राहें अपनी,
राह दिखाने आया था।।

घोर अंधेरा जग में छाया,
नजर नहीं कुछ आता था
मानवः मानव की ठोकर से
जब ठुकराया जाता था
आर्य जाति सोई पड़ी थी,
घर-घर जा के जगाता था।।

बंट गया सारा टुकड़े-टुकड़े,
भारत देश जागीरों में
शासन करते लोग विदेशी,
जोश नहीं था वीरों में।
भारत मां को मुक्त किया,
जो जकड़ी थी जंजीरों में।।

जब तक जग में चार दिशायें,
कुदरत के ये नजारे हैं
सागर-नदियां धरती-अम्बर
जंगल पर्वत सारे हैं।
पथिक रहेगा नाम ऋषि का,
जब तक चांद-सितारे हैं।।