गुरुदेव दयानन्द ! तुझे धन-धन-धन तेरी दया
गुरुदेव दयानन्द !
तुझे धन-धन-धन तेरी दया
व उदारता ने जीत लिया मन।
कैसा जादू किया तूने
भ्रम मेट दिया तूने ।।
जब से पढ़ा है हमने,
सत्यार्थ प्रकाश को।
तब से ही भूल बैठे,
अन्धविश्वास को।
दूर हुये सब विघन …
तुझे धन-धन ।।
हृदय विशाल देखो,
कैसा योगीराज का
लेशमात्र लोभ था न,
तख्त और ताज का।
तूने छुये न रतन…
तुझे धन-धन ।।
तर्क की कसौटियों पर,
पूरा ही तू पाया है
हजारों विरोधियों ने,
तुझे आजमाया है।
गये करके नमन ….
तुझे धन – धन।।
किसी ने पिलाये तुझे,
विष भरे प्याले
किसी ने बेमोल फेंके,
विषधर काले।
किये लाखों ही यतन…
तुझे धन धन ।।










