तेरी अजब निराली रचना का
तेरी अजब निराली रचना का,
किसी को न भेद मिले गये सब हार।
कहीं तिनका तक नहीं उगता है,
कहीं धूली में फूल खिले गूंथ रहे हार।।
पत्ता-पत्ता डाली में,
उपवन की हरियाली में
बसे हुये हो तुम ही भगवन,
फल-फूलों में, माली में।
तेरे हुक्म बिना जग के राजा,
पत्ता भी न कोई हिले है शक्ति अपार ।।
बिना हाथ के जगत् रचा,
कैसा खेल रचाया है
बिन सुई और धागे के,
नर चोला सा पहनाया है।
सूरज चन्दा के भीतर,
क्या ज्योति निराली
जले न पाया पार ।।
कर्म में जीव स्वतन्त्र किया,
फल पाने में बांध लिया
जिसने जैसा कर्म कमाया,
फल उसको वैसा ही मिला।
जो पेड़ बबूल का बोयेगा तो,
आम कहां से मिले देख लो विचार ।।
सोच रहा वैज्ञानिक जन,
कर ले सिन्धु जरा मंथन
एक भेद को खोल न पाये,
भेद दूसरा हुआ गहन ।
कितना है अटल विधान तेरा,
टाले न किसी से टले है शक्ति अपार ।।










