दीन दयाल दया के सागर

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दीन दयाल दया के सागर

ओ३म् वाक् वाक् ।
ओं प्राणः प्राणः ।
ओं चक्षुः चक्षुः ।
ओं श्रोत्रम् श्रोत्रम् ।
ओं नाभिः । ओं हृदयम्।
ओं कण्ठः । ओं शिरः।
ओं बाहुभ्यां यशोबलम्।
ओं करतलकर पृष्ठे ।। २।।

भावार्थ:-
दीन दयाल दया के सागर,
दीजे हमको बुद्धि उजागर।
ज्ञान-कर्म दश इन्द्रिय मेरे,
कभी न आवे पाप के नेड़े।
रस भरी शुभ बोलें वाणी,
प्राण पवित्र करो हे स्वामी।


दो आंखें दो कान पिता जी,
देखें सुने पवित्र कथा ही।
नाभि हृदय कंठ भुजायें,
हाथों से न पाप कमाये।
यश बल जितना मिले प्रभुजी,
शुभ कर्मों में लगे सदा ही।