प्रभु को विसार किसकी आराधना करूं मैं।
प्रभु को विसार किसकी
आराधना करूं मैं।
पा कल्पतरु किसी से
क्या याचना करूं मैं?
मोती मुझे मिला जब
मानस के मानसर में।
कंकर बटोरने की क्यों
कामना करूं मैं? ।।१।।
सब के परमपिता जब
घटघट में रम रहे हैं।
लघु जान क्यों किसी
की अवहेलना करूं मैं? ।।२।।
मुझको ‘प्रकाश’ प्रतिपल
आनन्द आन्तरिक है।
जग के क्षणिक सुखों की
क्यों चाहना करूं मैं?।।३।।
॥ हे मानव ! तू पत्ते से भी हल्का बन, अर्थात् नम्न बन।।










