ये बात पुरानी है
तर्ज – जब हम जवाँ होंगे……
ये बात पुरानी है,
जो तुम्हें सुनानी है।
अंग्रेज आये थे यहाँ,
भारत में बसने को,
मेरे देश को इसने को ।।
ये बात………..
शुरू शुरू में बातें
मीठी करते थे “सचिन”
खजानों पे वो नीयत धरते थे
ले उड़े वो सोने की चिड़िया
धिक्कार है हंसने को मेरे देश को……
पहले तो आकर के
पैर जमाये थे देशवासी
फिर मेरे उलझाये थे
दे दी शरण हमने उन्हें,
खुद जाल में फंसने को
मेरे देश को………
गोरे रंग वाले वो
कोले नाग थे खूब
जिन्होंने खेले खूँ के फाग थे
भारत माँ के दीवानों को,
फाँसी में कसने को
मेरे देश को……..
माथे से भारत माँ के
उतरी बिन्दिया जिस
दिन आयी थी
उनकी वो ईस्ट इण्डिया
वो कहर की बदली आयी थी,
बस यहाँ बरसने को
मेरे देश को………










