तर्ज -तुम अगर साथ देने का वादा करो….
छल फरेबी से जीवन,
बिताया अगर,
ज़िन्दगी ये समझ ले रे,
बेकार है। पाप दिल में जो तेरे,
समाया रहा, ये समझ तेरी नैंया ये,
मझधार है।
साथ दुःख में किसी का निभाया नहीं
शुभ कर्मों से भी मजबूर रहा
उलझनों में ये मन तेरा उलझा रहा
प्रभु भक्ति से भी तू दूर रहा
ओ ‘सचिन’ वो प्रभु है
सबका पितां जिस प्रभु ने
रचा ये संसार है छल फरेबी से……
दूसरों का भला ना कभी
कर सका गीत अपने
सुखों के ही गाता रहा
मुफलिसों के लहू को
अरे चूसकर अपने बच्चों
को रोटी खिलाता रहा
ना कमाई ये तेरी फलेगी
कभी देख लेना मिलेगी
तुझे हार है छल फरेबी से……
है भलाई का बदला भलाई
बशर कर सके तो किसी का
कर ले भला दीन दुखियों का
दिल ना दुखाना कभी फल
हमेशा बुराई का होगा
बुरा बात है ये मेरी सच
झूठी नहीं इस जहाँ में
प्रभु की सरकार है
छल फरेबी से……










