आयी थी जिसकी बारात,की विदा प्रीतम के साथ।
तर्ज – वक्त से दिन और रात…….
(कल जहाँ बसती थी खुशियाँ,
आज है मातम वहाँ।
वक्त लाया था बहारें,
वक्त लाया है खिज़ा ॥)
आयी थी जिसकी बारात,
की विदा प्रीतम के साथ।
चल बसी संसार से,
छोड़कर प्रीतम का हाथ।
ओ सचिन “सारंग” कब तक,
शान्त होगी ये अगन,
यूँ तड़फ कर मर रही क्यूँ,
दुल्हनें दिन और रात-2
आयी थी जिसकी…….
लाल फेरों की वो साड़ी,
बन गया उसका कफ़न,
रात को जिन्दा जली वो,
ना नज़र आया प्रभात-2
आयी थी जिसकी…..
जल रही मजबूरियों में,
उस बेचारी की चिता,
ना किसी ने प्यार से पूछी,
उसके दिल की कोई बात-2
आयी थी जिसकी…….










