मेरी अखियों से दूर, चली होके मजबूर
तर्ज – तेरी दुनियाँ से दूर……
दहेज की आग में एक देवी जलायी गयी, जलने के बाद पिताजी जब श्मशान घाट से घर की ओर लौटते हैं तो तड़पते हुए कहते हैं –
मेरी अखियों से दूर,
चली होके मजबूर,
तुझे क्या हो गया
मैं ही तेरा हूँ पिता,
तेरी जली क्यूँ चिता,
तुझे क्या हो गया।
लाल जोड़ा फेरों का
मेरी लाड़ली का बना है
क्यूँ कफन अग्नि
के अन्दर बता दो
“सचिन” ये जला है
क्यूँ बदन जला है क्यूँ बदन,
जली है क्यूं दुल्हन
तेरे गले में था हार,
तूने किया था सिंगार,
तुझे क्या हो गया
तेरी गलियों से
विदा हो चला हूँ
ना आऊँगा कभी
प्यार से कभी ना हँसाऊँगा
तुझे ना रूलाऊँगा
कभी रूलाऊँगा कभी,
ना चली छोड़ मनाऊँगा
कभी के संसार माता
पिताजी का प्यार,
तुझे क्या हो गया मैं ही तेरा
भाई तेरे पूछेंगे कैसी है
बहन तो बताऊँगा
मैं क्या हाले दिल पूछेगी
तेरी माँ मुझे तो सुनाऊँगा
मैं क्या सुनाऊँगा मैं क्या,
दिखाऊँगा मैं कहे दिल की हुये
सपने नाकार, तुझे क्या
मैं ही तेरा क्या पुकार हो गया










