प्रभु कहाँ छुपा है

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प्रभु कहाँ छुपा है

तर्ज – ओ रात के मुसाफिर, चन्दा……

प्रभु कहाँ छुपा है,
इतना काई बता दो।
उसका कहाँ मकां है,
इतना कोई बता दो।

सारी “सचिन” ये सृष्टि,
क्या खूब है सजायी हँसती हुई
ये कलियाँ, उनसें सभी खिलायी
फिर भी क्यों बेनिशां है,
इतना कोई बता दो
उसका कहाँ मकाँ है………

संसार ये रचाया,
दृष्टि कभी ना आया
सारे जहाँ का वाली,
फिर भी ना पार पाया
क्या उसकी दास्ताँ है,
इतना कोई बता दो
उसका कहाँ मकाँ है………

पंछी भी गा रहे हैं,
खुशियाँ मना रहे हैं
भगवन है मीत सबका,
नगमें सुना रहे है कैसा
वो मेहरबाँ है,
इतना कोई बता दो
उसका कहाँ मकाँ है………

नभ में ये चाँद तारे,
उसके सभी सहारे आते
नज़र ये सारे, उसके सभी
नज़ारे फिर भी क्यों लापता है,
इतना कोई बता दो
उसका कहाँ मकाँ है……….