नहीं धन धाम धरती पद व तख्तोताज चाहते हैं

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नहीं धन धाम धरती पद व तख्तोताज चाहते हैं

नहीं धन धाम धरती पद
व तख्तोताज चाहते हैं,
सुनो ए दुनियां वालो
आर्य क्या आज चाहते हैं,
फसी बैठी है दुनियां जाति
फिरकों के सिकंजों में,
सिकुड कर रह गई इन्सानियत
मजहब के पंजो में,
सदा इन्सानों पै इन्सानियत
का राज चाहते हैं।।1।।

मोक्ष के ठेकेदारों के
लगे ताले दिमागों पर,
अन्धेरा स्वार्थ का छाया
हुआ दिल के चिरागों
पर सोचने और कहने का
सही अन्दाज चाहते हैं।।2।।|

चिकित्सा और शिक्षा
न्याय रोटी,वस्त्र सबको घर,
मिलें जीवन उपयोगी
सुविधायें सबको हो समस्तर,
विषमता ना हो जिसमें
वह समृद्ध समाज चाहते हैं।।3।।

परोपकारी दयालु न्यायकारी
धार्मिक जन हों,
सत्य और मीठी वाणी हो
स्वास्थ्य अच्छा हो शुद्ध मन हो,
वह प्रेमी सुमधुर सुन्दर सुखद
सुख साज चाहते हैं।।4।।