यज्ञशिष्ट भोजी,ब्रह्मानन्द भोगी।

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यज्ञशिष्ट भोजी,ब्रह्मानन्द भोगी।

यज्ञशिष्ट भोजी,
ब्रह्मानन्द भोगी।
खुद भर न खा,
रहेगा तू पाप बचा ।। १11

सहजतः बांट के खा,
स्वाद पा खुद खुद का।
सब संग भोग, इन्द्र संग योग ।। २ ।।

बन यज्ञ शिष्टाशी,
जुड़ ब्रह्म अविनाशी ।
लघुतम जीवन,
कंजूस न बन ।। ३ ।।