अन्याई से लड़ना सीखो
अन्याई से लड़ना सीखो,
अन्याई से लड़ना सीखो ।
लेना अपनी मंजिल पर दम,
बीच राह में ऊब न जाना।
इस अथाह संसृति सागर में,
पत्थर जैसे डूब न जाना ।।
कूद पड़ो गहरे सागर में,
काष्ठ समान उभरना सीखो ।। १ ।।
रस की बून्द पिलाए कोई तो,
तुम रस के कलश उलीचो ।
यदि अपमान करें कोई तो,
पकड़ जुबान हाथ से खीचों ।।
ऊँगली दिखाए कोई तो,
तमक तमाचा जड़ना सीखो ।। २ ।।
कायरता दो छोड़ बनो धुन
के पक्के मर्दाने मन के।
गहो दीन का हाथ तुम,
चरणों के चाकर सज्जन के ।।
अधम अधर्मी उद्दण्डों से,
सीना तान अकड़ना सीखो ।। ३ ।।
झूम झूम कर मधुशाला में,
मधु के प्याले बहुत पी लिए।
अपनी रंगरेली अठखेली के,
दिन जग में बहुत जी लिए।
देश बन्धुओं की रक्षा हित,
अब संकट में पड़ना सीखो ।। ४ ।।
वचन प्रकाश यहीं कवियों
का नीति शास्त्र यही कहता है।
अत्याचारी से अति पापी
अत्याचार जो कि सहता है।।
देश द्रोहियों के विनाश हित ,
कर में शस्त्र पकड़ना सीखो ।। ५ ।।










