प्रभु को बिसार किसकी
प्रभु को बिसार किसकी
आराधना करूं मैं।
पा कल्पतरु किसी से
क्या याचना करूं मैं।
मुझको ‘प्रकाश’ प्रतिपल
आनन्द आन्तरिक है।
जग के क्षणिक सुखों को
क्यों कामना करूं मैं।
मोती मुझे मिला जब
मानस के मानसर में।
कंकड़ बटोरने की क्यों
याचना करूं मैं।
जग के परमपिता जब
कण-कण में बस रहे हैं।
लघु जान क्यों किसी की
अवहेलना करूं मैं।










