सृष्टि के तार तार में
सृष्टि के तार तार में,
मेरे ओम् छिपे बैठे हैं।
यह लोक लोकान्तर सारे,
यह दृश्य है न्यारें न्यारें।
तारों की हर झंकार में,
मेरे ओम् छिपे बैठे हैं।।१।।
है अजर अमर अविनाशी,
हृदय के सत्य विचार में,
न मिले यह मथुरा काशी।
मेरे ओम् छिपे बैठे हैं।।२।।
योगी जन ध्यान लगावें,
ऋषि मुनि तेरा यश गावें।
भक्ति की मस्त पुकार में,
मेरे ओम् छिपे बैठे हैं।।३।।
कहीं अंत न तेरा पाया,
सब हारे शीश झुकाया।
मुक्ति के ऊँचे द्वार में,
मेरे ओम् छिपे बैठे हैं।।४।।
प्रेम सबसे करो, विश्वास कुछ पर करो।
बुरा किसी का मत करो ।।










