ईश्वर स्तुति,प्रार्थना और उपासना क्या है ?

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ईश्वर स्तुति प्रार्थना और उपासना

वैदिक धर्म में ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना और उपासना नित्य कर्म माने जाते हैं। इनका उद्देश्य केवल पुण्य अर्जित करना नहीं, बल्कि आत्मोन्नति और ईश्वर से निकटता प्राप्त करना है।

स्तुति

स्तुति का अर्थ है ईश्वर के गुणों का वर्णन करना। जब हम किसी के गुणों की चर्चा करते हैं, तो उससे हमारा ज्ञान और श्रद्धा बढ़ती है। जैसे एक विशेषज्ञ किसी वस्तु को गहराई से समझता है, वैसे ही ईश्वर की स्तुति करने से हम उसके गुणों को अधिक स्पष्टता से जान पाते हैं। वैदिक धर्म में नित्य ईश्वर की स्तुति करने का नियम इसलिए बनाया गया ताकि प्रत्येक आर्यजन ईश्वर के गुणों से परिचित हो सके और उनसे प्रेरणा लेकर अपने जीवन को उन्नत बना सके।

प्रार्थना

प्रार्थना का अर्थ है कुछ मांगना। मनुष्य अल्पज्ञ और अल्पशक्तिवान है, इसलिए अपनी त्रुटियों को दूर करने और आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वह प्रार्थना करता है। जब हम ईश्वर के गुणों को जानते हैं, तो उन्हीं गुणों को अपने भीतर धारण करने के लिए प्रार्थना करते हैं। परंतु केवल प्रार्थना पर्याप्त नहीं है, उसके साथ उचित प्रयास भी करना आवश्यक है। यदि हम केवल प्रार्थना करते हैं और प्रयास नहीं करते, तो कोई विशेष लाभ नहीं होगा।

उपासना

उपासना का अर्थ है ईश्वर के समीप जाना। इसका वास्तविक अर्थ है ईश्वर के गुणों को अपने जीवन में धारण करना

  • यदि हम ईश्वर की स्तुति में कहते हैं कि वह न्यायकारी है, तो हमें स्वयं भी न्यायप्रिय बनना चाहिए।
  • जब हम प्रार्थना करते हैं कि हमें भी ईश्वर की भांति पवित्रता, सत्यता और दयालुता मिले, तो हमें उन गुणों को अपने आचरण में भी उतारना होगा।
  • जब हम अपने जीवन में इन गुणों को अपनाने लगते हैं, तभी हमारी उपासना सफल होती है।
स्तुति, प्रार्थना और उपासना का महत्व

महर्षि दयानंद सरस्वती ने सत्यार्थप्रकाश में लिखा है:
प्रश्न: क्या ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना और उपासना करनी चाहिए?
उत्तर: हां, करनी चाहिए।

प्रश्न: क्या इससे ईश्वर अपने नियमों को छोड़कर हमारे पापों को मिटा देगा?
उत्तर: नहीं, ईश्वर अपने नियमों को नहीं बदलता।

प्रश्न: तो फिर स्तुति, प्रार्थना और उपासना करने का क्या लाभ है?
उत्तर: स्तुति से ईश्वर के प्रति प्रेम उत्पन्न होता है और हम अपने गुण, कर्म, स्वभाव को सुधारते हैं।

  • प्रार्थना से अहंकार दूर होता है, उत्साह बढ़ता है और हमें ईश्वर से सहायता मिलती है।
  • उपासना से हम ईश्वर के और निकट आते हैं तथा उसका साक्षात्कार कर सकते हैं।

इसलिए, प्रत्येक वैदिक धर्मी को स्तुति, प्रार्थना और उपासना को अपने जीवन का अनिवार्य अंग बनाना चाहिए, जिससे उसका आध्यात्मिक विकास हो और वह ईश्वर के सत्य स्वरूप को समझकर उसका अनुसरण कर सके।

✍🏻 साभार – स्वामी स्वतंत्रानंद जी

॥ ओ३म् ॥