जय जय पिता परम आनन्ददाता
जय जय पिता परम
आनन्ददाता
जगदादि कारण
मुक्तिप्रदाता
अनन्त और अनादि
विशेषण हैं तेरे
सृष्टि का स्रष्टा तू
धर्ता संहर्ता
जय जय पिता परम
आनन्ददाता
सूक्ष्म से सूक्ष्म
तू है स्थूल इतना
कि जिसमें ये ब्रह्माण्ड
सारा समाता
जय जय पिता परम
आनन्ददाता
करो शुद्ध निर्मल
मेरे/मेरी आत्मा को
करूँ मैं विनय नित्य
सायं व प्रातः
जय जय पिता परम
आनन्ददाता
बिना तेरे है कौन
दीनन का बन्धु
कि जिसको मैं अपनी
अवस्था सुनाता
जय जय पिता परम
आनन्ददाता
“अमी”रस पिलाओ
कृपा कर के मुझको
रहूँ सर्वदा तेरी
कीर्ति मैं गाता
जय जय पिता परम
आनन्ददाता
जगदादि कारण
मुक्तिप्रदाता
जय जय पिता परम
आनन्ददाता










