बनते बनते बात बिगड़ती, जब स्वार्थ मन में आता है
बनते बनते बात बिगड़ती
जब स्वार्थ मन में आता है
किन्तु प्रभु की शरण को पाकर
मन सद्गुणों को निभाता है
गहरे गहरे विषय-भोग
राह अनजानी रे
पाप दूरित की
चाह मनमानी रे
असत् अनत अघ
अरस अनय का
मार्ग जीवन को सताता है
प्रभु !! मार्ग जीवन को सताता है
बनते बनते बात बिगड़ती
जब स्वार्थ मन में आता है
अज्ञान वृत्तियाँ ना हों कर्तव्यहीन
कामादि रोग ना लें लेवें सुख छीन
छुटकारा दो इनसे प्रभुजी
पाप से तू ही बचाता है
प्रभु ! पाप से तू ही बचाता है
बनते बनते बात बिगड़ती
जब स्वार्थ मन में आता है
असत् को त्याग दें
ना हो कर्म की हानि रे
द्वेष-दुरित जाएँ भाग
बोलें मधुर वाणी रे
पाएँ ना पशु-पक्षियों की योनि
लेकिन पाप ले जाता है
हाँ ! लेकिन पाप ले जाता है
बनते बनते बात बिगड़ती
जब स्वार्थ मन में आता है
द्वेष-वृत्ति पिण्ड ना छोड़ें
भाइयों की नादानी रे
क्रोध से साथ छूटे
कैसी ये नादानी रे
भय, भ्रम, भूल-भुलैया भगाओ
प्रभु तू ही तो पिता माता है
बनते बनते बात बिगड़ती
जब स्वार्थ मन में आता है
त्याग दें विकर्म तो, दे देना ऐश्वर्य
जिससे करें हम शुभ कर्म वर्य
पाये ऐश्वर्य को बाँट सकें हम
युक्ति यही तू सिखाता है
बनते बनते बात बिगड़ती
जब स्वार्थ मन में आता है
किन्तु प्रभु की शरण को पाकर
मन सद्गुणों को निभाता है










