तन-मन-जीवन सेवाभाव भरा

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तन-मन-जीवन सेवाभाव भरा

तन-मन-जीवन सेवाभाव भरा
उर-अंतर गीताप्रेम अनन्य गहरा

कर्मयोगी-कर्मठ निपुण-निरहंकारी बड़े
सेवा-सत्संग ज्ञानयज्ञ आहुति देने चले

प्रेम-भक्ति रथ जगन्नाथ खींचने
देखो कितने-कितने हाथ हैं बढ़े

सुकृत-सुगढ़-सुदर्शन-सुनहरे
माधव मुकुट मोर पँख से सज रहे

न कोई दुख, पीड़ा न, कष्ट से कराहते
मुखमंडल दिव्यआभा से मुस्कुराते

एक एक पल जिनका बनी आरती
शब्द प्रत्येक उनके गुरुमंत्र भांति

लेते ही नाम हो जाते पल में सारे काम
मानो चलाया हो किसी ने अमोघ रामबाण

बन गया पवित्र तीर्थ अब उनका धाम
हे सेवा वीरों तुम्हें हमारा कोटिश प्रणाम…