जाना नहीं जीवन का अभिप्राय मेरा क्या है
जाना नहीं जीवन का
अभिप्राय मेरा क्या है
वशीभूत राग-भय से
आशय छुपा हुआ है
जाना नहीं जीवन का
जैसा असत्य-भाषण
वैसा बना है चिन्तन
कलुषित मनस्-उद्योग में
कृत्रिम बना जीवन-क्रम
अभिप्राय सत्य-सत्त्व का
छूटा ही जा रहा है
जाना नहीं जीवन का
अभिप्राय मेरा क्या है
जब छूटी ये अवस्था
इस आत्म-वञ्चना की
दुर्भगा की वृत्ति त्यागी
वृत्ति जगी सुभगा की
अब लज्जा-भय भी छूटा
सत्य-ज्ञान समा रहा है
जाना नहीं जीवन का
अभिप्राय मेरा क्या है
फिर आज से बना दूँ
सच्चा सुभग ये जीवन
सत्य-ज्ञान होवे उद्बुद्ध
मानस का हो उद्दीपन
आकूति चित्त की माता
उसे मन पुकार रहा है
जाना नहीं जीवन का
अभिप्राय मेरा क्या है
है वाणी वैखरी कर
तू पुकार आकूति की
मनोराज्य का दुराशय
कर दूर ऋजु विधि से
आशय बना सङ्कल्पित
जीवन जगा रहा है
जाना नहीं जीवन का
अभिप्राय मेरा क्या है
अब कोई भी शुभेच्छा
चलूँ सही दिशा में लेकर
शुद्ध रूप होवे जिसका
हो प्रकाश का अन्वेषण
तब गौण इच्छाओं का
आधार कहाँ रहा है ?
जाना नहीं जीवन का
अभिप्राय मेरा क्या है
वशीभूत राग-भय से
आशय छुपा हुआ है
जाना नहीं जीवन का










