कौवा जैसा चतुर बने, और बगुला जैसा ध्यान करे।

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कौवा जैसा चतुर बने, और बगुला जैसा ध्यान करे।

कौवा जैसा चतुर बने,
और बगुला जैसा ध्यान करे।
कुत्ते जैसी निद्रा कर ले,
सूक्ष्म भोजन पान करे।।
अपना त्यागी भेष बनावे,
घर का ना गुणगान करे।
ऐसा ही बटु विद्या पावे,
“धर्मीं”सत्य बखान करे।।

जो जन चारों वेद पढ़े,
अरु और को वेद पढाता है।
अपने घर में यज्ञ करे,
अरु और को यज्ञ कराता है।।
निश दिन दीन को दान करे,
तब दान और से पाता है।
इन छ: कर्मों से ही “धर्मी”,
मनुज”ब्राह्मण”कहाता है।।

प्रजा की जो रक्षा करता,
और कहाता दानी जो।
अपने घर में यज्ञ करे,
और पढे वेद की वाणी जो।।
शक्ति का संचार करे,
व्यभिचार से करे गिलानी जो।
“धर्मी”क्षत्रिय वहीं कहावे,
बने वीर बलदानी जो।।

वैश्य पशु का पालन करता,
करता खेती क्यारी जो।
निश दिन घर में यज्ञ करे,
और दोनों का हितकारी जो।।
वेद पढ़न में भूल करे ना,
ऐसा है व्रत धारी जो।
देकर,दूना कभी न लेता,
कहलावे व्यापारी जो।।

जो जन विद्या नहीं पढ़े,
और मूर्ख मूढ गंवार रहै।
जीवन के निर्वाह हेतु,
जो औरों के आधार रहे।।
ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य वर्ण,
तीनों का सहता भार रहे।
“धर्मीं”वो ही शूद्र कहाता,
सेवा से जिसे प्यार रहे।।