मिले मन मन्दिर में भगवान्, मिटा ले मैल अरे नादान !!

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मिले मन मन्दिर में भगवान्, मिटा ले मैल अरे नादान !!

मिले मन मन्दिर में भगवान्
मिटा ले मैल अरे नादान !!

गङ्गा यमुना जी के तट पर
गोकुल मथुरा वंसी वट पर
नाहक क्यों होता हैरान
मिटा ले मैल अरे नादान !!

फूलों में सुवास है जैसे
गन्ने में मिठास है जैसे
प्रभु भी तेरे दिल दरम्यान
मिटा ले मैल अरे नादान !!

कस्तूरी मृग की नाभि में
मूरख ढूँढत वन झाड़ी में
तड़प तड़प कर देता प्राण
मिटा ले मैल अरे नादान !!

तेरे पास बसे तेरा प्यारा
लेकिन तू फिरे मारा मारा
क्यों तू भटक रहा अज्ञान
मिटा ले मैल अरे नादान !!

तज अज्ञान, शुद्ध कर निज मन
“प्रकाश” निश्चय हो प्रभु दर्शन
पावे तू आनन्द महान्
मिटा ले मैल अरे नादान !!

मिले मन मन्दिर में भगवान्
मिटा ले मैल अरे नादान !!

रचनाकार : – पण्डित श्री प्रकाश चन्द्र जी आर्य कविरत्न