हरते हो सब की पीर तुम
हरते हो सब की पीर तुम
मेरी भी तो हरा करो
हरदम हरि** हृदय हरा (1)
ऐसा ही तुम किया करो
हरते हो सब की पीर तुम
मेरी भी तो हरा करो
हर झर झरे पहाड़ से
झरने निराली शान से
मेरे भी मन की भूमि में
झरने से तुम झरा करो
हरते हो सब की पीर तुम
मेरी भी तो हरा करो
सरिता समुन्दर झील में
सुन्दर समीर भर दिया
मेरे भी मन की भूमि में
अमृत से तुम भरा करो
हरते हो सब की पीर तुम
मेरी भी तो हरा करो
धरती में एक बीज से
कितने ही बीज वाले हम
मेरे भी मन की भूमि में
ऐसे ही तुम उगा करो
हरते हो सब की पीर तुम
मेरी भी तो हरा करो
पी पी पुकार कर रहा
प्यासा पपीहा आपका
प्यासा तुम्हारे दर्प का
बनके घटा घिरा करो
हरते हो सब की पीर तुम
मेरी भी तो हरा करो
हरदम हरि हृदय हरा
ऐसा ही तुम किया करो
हरते हो सब की पीर तुम
मेरी भी तो हरा करो


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