ये ओऽम् है तेरा मानव रे
ये ओऽम् है तेरा मानव रे
भटकता कहां ।। टेक ।।
वेद बखानी प्रकृति सुहानी,
झूठी है इसकी कहानी।
ये झूठा बसेरा,
मानव रे भटकता कहां ।। १ ।।
तिनके चुन चुन, सपने बुन बुन,
नाचे तू जगत की धुन ।
जगत ना तेरा, मानव रे
भटकता कहां ।। २ ।।
कल्पना है काल, दिग्देश भ्रमजाल,
ब्रह्म जो खोया सो ही कंगाल।
फिर फिर का फेरा मानव रे
भटकता कहां ।। ३ ।।










