ये मानव तन कितना पावन

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ये मानव तन कितना पावन

ये मानव तन कितना पावन,
यदि चाहे तू इसको पाना।
जीवन के अन्तिम क्षण तक भी,
शुभ कर्म सदा करते जाना ।।

तूने पिछले ही कर्मों से,
ये मानव चोला अब पाया
बोया जो वृक्ष आम्र का था,
फल उसका तूने यह खाया
इस वैभव को पाकर बन्दे,
यूं ही ना जग में इतराना ।।

तन भी सुन्दर तेरा तब तक,
जब तक ईश्वर का साया है
है सब कुछ ही उसकी महिमा,
केवल उसकी ही माया है।
ऋषियों ने मुनियों ने केवल,
उसकी सत्ता को पहचाना ।।

जितनी भी जग में योनि हैं
सब भोग योनि कहलाती हैं
केवल मानव योनि ही है,
मानव का ये उद्देश्य नहीं,
जो कर्म से जानी जाती है।
समझा तूने पीना खाना ।।

जब तक प्रातः सायं को,
गुण ईश्वर के ना गायेगा
अष्टांग योग की सिद्धि से,
यदि ना उसको तू ध्यायेगा।
जब अन्त समय होगा तेरा,
होगा फिर तुझको पछताना ।।

अतएव श्याम जग में रहकर,
शुभ कर्म सदा करते रहना
कितनी ही विपदा हों सर पर,
हंसते-हंसते उनको सहना।
उन विपदाओं की आपद से,
जीवन में ना तू घबराना ।।