यह मानव का चोला क्यों

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यह मानव का चोला क्यों (धुन-आ मेरे हमजोली आ)

यह मानव का चोला क्यों
चोलों मे अनमोला क्यों।
ऋषियों ने बताया है
नहीं समझ में आया है।
कोई समझा दो समझा।। टेक।।


आहार निद्रा भय मैथुन
तो पशु मनुष्य में सम है।
लेकिन और सब बातों में
तो मनुष्य पशु से कम है।।
करो मुकाबला ।।1।।

हड्डी मांस खून से
इसके बदबू आती पूरी।
रत्तियों में बिकती है
सुगन्धित मृगा की कस्तूरी ।।
हाड़ में गज से घटा। |2 ||

चाम की तुलना में भी पशु
से मनुष्य हार गया बाजी।
भेड़ों से बालों में हारा,
फिर भी हों रहा राजी ।।
गई शर्मों हया ।।३।।

मल और मूत्र मनुष्य से
ज्यादा पशुओं का उपयोगी।
फिर बतलाओं मनुष्य की
योनि उत्तम कैसे होगी।।
कैसे माने भला।।4 ||

मनुष्य वही है जो मननशील
हो धर्म कर्म का ज्ञाता ।
मनुष्य का चोला पा करके
यह जीव मोक्ष में जाता ।।
‘प्रेमी’ यूँ हैं बड़ा।।5।।