यह कैसा प्रभु का चिन्तन है

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यह कैसा प्रभु का चिन्तन है

यह कैसा प्रभु का चिन्तन है
चित्त को चैन नहीं पलभर।
हाथ में माला के मनके मन
भटक रहा है कहीं-कहीं पर॥ टेक ॥


पाप वासनाओं का चित्त
पर मैल चढ़ाये बैठा है।
स्वयं अविद्या में है फंसा
औरों को फंसाये बैठा है॥


नाम का योगी अन्दर
अनगिन रोग छिपाये बैठा है।
बगुले भक्त की भांति अपना
ढोंग बनाये बैठा है॥
सजाये बैठा है तन जग को
घुमा रहा है चक्कर पर॥1॥

वासनाओं से छुटने की
जब तक ना प्रवृति होगी।
प्रवृति कैसे छुटे जब तक
याद नहीं युक्ति होगी ॥


जिसका कर्म उपासना जग में
ज्ञान की भी शुद्धि होगी।
इन तीनों की शुद्धि से ही
आत्मा की मुक्ति होगी॥
भक्ति होती है नहीं छल से
रचकर बैठे आडम्बर ॥2॥

धन के लोभी लूट-लूट कर
भवन बनाते जाते हैं।
उन भवनों को वासनाओं के
युक्त सजाते जाते हैं॥


पंखे कूलर संगमरमर के
ही फर्श बिछाते जाते हैं।
जिनसे लिया धन ऐसे
पापियों को ही बिठाते जाते हैं।
पाते हैं सजा और भी दुख की
भक्त ये जितने योगेश्वर ॥3॥

जब मनको निर्विषय किया
नहीं ध्यान का लगना मुश्किल है
विषय वासनाओं का भी
अन्दर से भगना मुश्किल है॥


विषय वासना रह गई तो
बन्धन से छुटना मुश्किल है।
बन्धन से नहीं छूट पाया तो
प्रभु से मिलना मुश्किल है॥
चलना मुश्किल है इस पथ पर
‘कर्मठ’ असुर छिपे अन्दर ॥4॥