हर इक नज़ारा है ओम् का
(तर्ज – न तो कारवाँ की तलाश है)
यह जो सिलसिला है जहान का
यह तो कुल पसारा है ओम् का।
तुम उठा के नज़रें निहार लो
हर पल नज़ारा है ओम् का।
यह जो सिलसिला है जहान का…..
१. कहीं छाँव है कहीं धूप है।
सुख दुःख बदलने का रूप है।
यही जन्म मरण का स्वरूप है।
हरं नियम न्यारा है ओम् का।
यह जो सिलसिला है जहान का…..
२. नक्षत्र चन्द्र सूर्य का प्रकाश भी करे।
निर्माण भी करे तथा विनाश भी करे।
यह जो सिलसिला है जहान का…..
३. भूकम्प का झटका आ गया।
इक पल में धरती हिला गया।
और धूल में सब कुछ मिला गया।
यह तो इक इशारा है ओम् का।
यह जो सिलसिला है जहान का…..
४. संसार इतना विशाल है।
जिसकी न कोई मिसाल है।
उसी कारीगर का कमाल है।
हर खेल प्यारा है ओम् का।
यह जो सिलसिला है जहान का…..
५. ब्रह्म सत्य जीव सत्य यह संसार सत्य है।
अनादि व अनन्त का विचार सत्य है।
यह जो सिलसिला है जहान का…..
६. कोई भजन व्याख्यान क्या करे।
लिखकर भी गुणगान क्या करे।
कहो ‘पथिक’ इनसान क्या करे।
अनुचर बेचारा है ओम् का।
यह जो सिलसिला है जहान का…..










