यह भी कैसा मनचला है।

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यह भी कैसा मनचला है।

यह भी कैसा मनचला है।
छेद कर अपनी ही नांव में
करने दरिया पार चला है।

न आब रहा, न आबरू रही,
अब क्या सूखे कंठ को तू
आंसुओ से बुझाने चला है।
यह भी कैसा मनचला है।

आदम का भी न मान रहा
कहां आ दम भी ना रहा,
जंग लगी तलवार से ही
तू भी जंग जीतने चला है।
तू भी कैसा मनचला है।

मदर से कुछ सीखा नहीं,
मदरसे में सिखने चला है,
सिखानें में ही तो छला है
सिखानें वाला ही मनचला है।

मिसाइल भी मिस हो गई,
गोलियां भी खत्म हो गई,
फौज भी थककर सो गई,
गधे भी बैंच दिये हैं तूने,
अब किससे जंग जीतने चला है,
तू मनचला तुने खुद को ही छला है।

मिटा कर तूने अपनी ही हस्ती,
क्यों जेहादियों को पाला है।
तू भी क्या दिखाने चला है,
तू भी कैसा मनचला है।

भोग न पाया माटी के नूर को
मरकर ७२ हूर भोगने चला है।
मानव जन्म में मानव को न जाना,
तू ने अपनों को ही छला है।
तू भी कैसा मनचला है।

पाक दफन का स्थान ना रहा
करनी से वह अब पाक ना रहा
टूट टूट कर खंड खंड हो गया
यह कैसी नापाक चाल चला है।
तू भी कैसा मनचला है।

🇮🇳जयहिंद🇮🇳
🚩जय आर्यावर्त🚩
🧘जिसनें ओरों के लिए खड्डा खोदा है,वह खड्डा उसी के लिए खुदा हो गया।🔥
✍गोपाल सोनी🙏