यदि सुख चाहो तो धारलो

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यदि सुख चाहो तो धारलो

यदि सुख चाहो तो धारलो,
जीवन में नित्य कर्म तुम।। टेक ।।

प्रातः सायं एकान्त स्थान में
स्वयं शुद्ध हो संध्या करो ।।
सबसे पहले प्राणायाम,
फिर जगतपति का ध्यान धरो।
गायत्री के अर्थ विचारों
मन के सकल विकार हरो ।।

दृढ़ प्रतिज्ञावान बनो तुम
किसी काल में नहीं टरो।
सदा सत्यपुरुषों के विचार लो
पढ़ों नित्यप्रति निगमागम तुम ।।1।।

देवयज्ञ या अग्निहोत्र का
तत्पश्चात सामान करो।
अमृतोपस्तरणमसि इत्यादि
से फिर जलपान करो।।

अंग स्पर्श कर प्रज्वलित
अग्नि हवनकुण्ड दरम्यान करो।
सर्वोदय कारक औषधि
सबको अग्नि द्वारा दान करो।
औरों का कर उपकार लो,
धर्मात्मा बनो स्वयं तुम।।2।।1

पितृयज्ञ है माता पिता की सेवा
अन्दर मन लाना।
भोजन वस्त्रं आवश्यक वस्तु
उनको सादर पहुँचाना ।।
चौथा कर्म भोजन के समय
ग्रास न मुंह तक ले जाना।
कुत्ते कृमि का भाग पृथक
कर बाद में भोजन खुद खाना।।
संगठित बना परिवार लो करो
पालन गृहस्थ धर्म तुम ।।3।।

ऋषि मुनि योगी सन्यासी
जो आ पवित्र निज द्वार करें।
प्रेम पूर्वक ग्रहस्थी लोग
उस अतिथि का सत्कार करें।।

भेंट करें आवश्यक वस्तु
कभी न गुप्त अधिकार करें।
सर्वोत्तम यह पंच महायज्ञ
जीवन बेड़ा पार करें।।
जो शेष है जीवन सुधार लो,
तजों ‘प्रेमी’ मिथ्या भ्रम तुम।।4।।