विश्वपति जगदीश तुम, तेरा ही ओम् नाम है,

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विश्वपति जगदीश तुम,तेरा ही ओम् नाम है,

विश्वपति जगदीश तुम,
तेरा ही ओम् नाम है,
मस्तक झुका के प्रेम से,
ईश्वर तुम्हें प्रणाम है।

सृष्टि बना के पालना,
दाता है तेरे हाथ में,
करना प्रलय भी अन्त में,
तेरा ही नाथ काम है।।1।।

मस्तक झुका के प्रेम से,
ईश्वर ऋतुएँ बदल के आ रहीं,
नदियाँ सिन्धु में जा रहीं,
शाम के बाद है सुबह,
सुबह के बाद शाम है।।2।।
मस्तक झुका के प्रेम से, ईश्वर…….

सूरज समय पै ढल रहा,
वायु नियम से चल रहा,
झुकता है सर यह देखकर,
तेरा जो इन्तजाम है।।3।।

मस्तक झुका के प्रेम से,
ईश्वर आता नजर नहीं मगर,
कण-कण में तू समा रहा,
जग में जहाँ पे तू न हो,
ऐसा न कोई धाम है।।411
मस्तक झुका के प्रेम से, ईश्वर……

होता है न्याय सर्वदा,
ईश्वर तेरे दरबार में,
चलती नहीं सिफारिशें,
चढ़ता न कोई दाम है।।5।।
मस्तक झुका के प्रेम से, ईश्वर…….

तेरे पदार्थ हैं प्रभो,
‘पथिक’ सभी के वास्ते,
सबके लिए हैं वेद भी,
जिनमें तेरा पैगाम है। ।6।।
मस्तक झुका के प्रेम से, ईश्वर…….