विश्वपति जगदीश तुम
विश्वपति जगदीश तुम,
तेरा ही ओ३म् नाम है।
मस्तक झुकाके प्रेम से
ईश्वर तुझे प्रणाम है ॥
“सृष्टि बनाके पालना”
दाता है तेरे हाथ में
करना प्रलय भी अन्त में,
तेरा ही नाथ काम है ।
सूरज समय पर ढल रहा,
वायु नियम से चल रहा
झुकता है सिर यह देखकर
तेरा जो इन्तजाम है ॥
ऋतुयें बदलके आ रहीं,
नदियाँ सिन्धु में जा रहीं
शाम के बाद है सुबह,
सुबह के बाद शाम है ।
आता नहीं नजर मगर,
कण-कण में तू समा रहा
जग में जहाँ में तुम न हो,
ऐसा न कोई धाम है ॥
होता है न्याय जिस घड़ी,
दाता तेरे दरबार में
चलती नहीं सिफारिशें,
चलता न कोई दाम है ॥
तेरे पदार्थ हैं सभी,
पथिक सभी के वास्ते
सबके लिए है वेद भी,
जिसमें तेरा पैगाम है ॥










