विश्वरथ का रथि

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इन्दुः पविष्ट चेतनः प्रियः कवीनां मतिः। सृजदश्वः रथीरिव

।। ऋग. ६.१६४.१० साम. ४८१

तर्जः मुत्तम पविड़वुम मुगिगळिल केवियुमा

दर्शन ऋषियों का जाता नहीं अकारथ
उनके हृदय-विचार सचमुच हैं प्रभुवत्
सुनते उनके हृदय के कान मनन में रहें अनुव्रत॥ ऋषियों का…

प्रभु-कथन अङ्ग अङ्ग में संदेश बन के छाये
अद्भुत ज्ञान प्रभु का हृदय मन को जगाये
हो जाये जीवन सार्थक सच्चे श्रोताओं को, बातें प्रभु की सुहाये
ऋषियों का…

जैसे रथ-चालक के रथ पे आरूढ़ होते।
स्वयं चल देता अश्व बिन चाबुक से मारे
ऐसे ही आत्मदर्शी के आते ही रंगमंच
पे हो जाते श्रोता अनुरक्त॥
ऋषियों का…

करते हैं पहले ऋषि तो संपूर्ण आत्म संयम ।
फिर सम्पूर्ण जगत को करते हैं उद्बोधन
धार्मिक विजय की यात्रा, निस्वार्थ करते अतिपन्न।
हो जाते तृप्त श्रावक॥
ऋषियों का…

सारथी-अश्व परस्पर, होते हैं चुम्बकीय
करते हैं स्नेह व्यासङ्ग, अश्व तो हैं आत्मीय
यही तो है एकात्मता, सचमुच ये है दैवीय
चलता चक्र अनवरत ॥
ऋषियों का…

विश्व ही है विजय रथ, सारथी ऋषि हैं चिन्तक
हम विश्व रथ के घोड़े जिन्हें पहुँचाते लक्ष्य तक
हैं जीवन संचारी वही हमारे पथिप्रज्ञ ऋषि तो हैं कारक॥
ऋषियों का…

(अकारव) विना लाभ का। (अनुव्रत) भक्त, निष्ठावान। (उद्बोधन) ज्ञान कराना,
चेताना। (अतिपन्न) अत्यन्त बढ़ा हुआ। (पचिप्रज्ञ) मार्ग का जानने वाला। (श्रावक)
सुनने वाले, श्रोता। (व्यासङ्ग) बहुत अधिक आसक्ति एक निष्ठता। (संचारी) गतिशील ।