विश्वपति के ध्यान में,जिसने लगाई हो लगन

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विश्वपति के ध्यान में,
जिसने लगाई हो लगन

विश्वपति के ध्यान में,
जिसने लगाई हो लगन
क्यों न हो उसको शान्ति
क्यूँ न हो उसका मन मगन
विश्वपति के ध्यान में

काम क्रोध लोभ मोह,
शत्रु हैं ये महाबली
इनके हनन के वास्ते
जितना हो तुझसे कर यतन
विश्वपति के ध्यान में

उससे अधिक न है कोई
जिसने रचा है ये जगत्
उसका ही रख तू आसरा
उसकी ही तू पकड़ शरण
विश्वपति के ध्यान में

जैसा किसी का हो अमल
वैसा ही पाता है वो फल
दुष्टों को कष्ट मिलता है
शिष्टों का होता दु:ख हरण
विश्वपति के ध्यान में

आप दयास्वरूप हैं
आप ही का है आसरा
कृपा की दृष्टि कीजिये
मुझ पे हो जब समय कठिन
विश्वपति के ध्यान में
जिसने लगाई हो लगन
क्यों न हो उसको शान्ति
क्यूँ न हो उसका मन मगन
विश्वपति के ध्यान में

(1)
श्री मुंशी केवल कृष्ण जी :- उर्दू के कवि तथा स्वामी दयानन्द जी के प्रति गहन आस्थावान्, आर्य समाज गुजरांवाला के प्रधान (जन्म 1828 निधन 1909), हिन्दी में उपनाम “केवल”, सन्ध्या का उर्दू पद्यानुवाद “सन्ध्या मंजूम”, आर्याभिविनय मंजूम, संगीत सुधाकर, भजन मुक्तावली आदि रचनाएँ

(2)
श्री केवल कृष्ण जी शर्मा :- आर्य समाज बरेली के उपदेशक, 1888 में स्वामी दयानन्द कृत आर्योद्देश्यरत्नमाला का हिन्दी पद्यानुवाद

(3)
पण्डित केवलानन्द शर्मा :- संस्कृत के रससिद्ध कवि थे
(4)
स्वामी केवलानन्द सरस्वती जी :- जन्म 1895 निधन 1949, भक्ति मार्ग, केवलानन्द भजन माला, भूलों की भूलें, ज्ञानदर्पण, आनन्दमंजूषा आदि केवल उपनाम से रचनायें

ऊपर की धुन-लय में नीचे की पंक्तियों को भी गाया जा सकता है जो मूल काव्य भजन रचना का ही हिस्सा है :–

मित्रता सबसे मन में रख
त्याग के वैर भाव को
छोड़ दे टेढ़ी चाल को
ठीक कर तू अपना चलन
विश्वपति के ध्यान में

उससे अधिक न है कोई
जिसने रचा है यह जगत्
उसका ही रख तू आसरा
उसकी ही तू पकड़ शरण
विश्वपति के ध्यान में

छोड़ दे राग द्वेष को
मन में तू उसका ध्यान कर
तुझ पै दयालु होंवेंगे
निश्चय ही वह परमात्मन्
विश्वपति के ध्यान में

ऐसा बना स्वभाव को
चित्त की शान्ति से तू
पैदा न हो ईर्ष्या की आँच
जो दिल में करे कहीं जलन
विश्वपति के ध्यान में

मन में हो मेरे चाँदनी
मोक्ष का रस्ता मिले
मार के मन जो “केवल”
इन्द्रियों का करे दमन
विश्वपति के ध्यान में