● महर्षि दयानन्द के ‘संस्कृत-वाक्य-प्रबोध:’ ग्रन्थ से संकलित बीस विचार-रत्न ●
- संकलन : भावेश मेरजा
विद्यार्थियों को संस्कृत संभाषण का अभ्यास करने में सहायता मिले इस उद्देश्य से महर्षि दयानन्द जी ने आज से लगभग 136 वर्ष पूर्व 1880 ई० (1936 वि०) में ‘संस्कृत-वाक्य-प्रबोध:’ नामक एक लघु-ग्रन्थ लिखा था । इसमें विभिन्न विषय सम्बन्धित अनेक संवाद संस्कृत एवं हिन्दी दोनों भाषाओं में दिए गए हैं । इस ग्रन्थ का स्वाध्याय करते हुए मैंने यह अनुभव किया कि इसमें तो ऐसे कई विचार-बिन्दु बिखरे पड़े हैं जिन्हें संकलित कर प्रस्तुत करने से कई जिज्ञासु पाठकों के लिए वे पठनीय एवं उपयोगी सिद्ध होंगे । इसी विचार से प्रेरित होकर महर्षि के उपर्युक्त ग्रन्थ से कुछ चुने हुए चिन्तन-सूत्र यहाँ प्रस्तुत किए जा रहे हैं –
● जो ईश्वर की उपासना करता है उसका विज्ञान बढ़ता है ।
● जो परोपकारी होता है वह सर्वथा सुखी होता है ।
● जो धर्म का सेवन करता है वही सुख पाता है ।
● जो योग का अभ्यास करता है वह ज्ञान-प्रकाश से युक्त होता है ।
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● जो मद्य पीनेवाला है उसकी बुद्धि न्यून होती है ।
● बुद्धिमान् पुरुष तो जितना पचे उतना ही खाता है ।
● जो शरीर से परिश्रम नहीं करता वह शरीर के सुख को प्राप्त नहीं होता ।
● जो आत्मा से पुरुषार्थ नहीं करता उसको आत्मा का बल भी नहीं होता ।
● जो पग से चलता है वह रोग-रहित होता है ।
● किसी को भी मैले कपड़े नहीं पहनने चाहिए ।
● जिसको पूर्ण विद्या और जो जितेन्द्रिय है उसको परोपकार करने के लिए
संन्यासाश्रम का ग्रहण करना शास्त्रोक्त है ।
● जैसा संन्यासाश्रमी से मनुष्यों का उपकार हो सकता है वैसा गृहाश्रमी से नहीं हो सकता, क्योंकि अनेक कामों की रुकावट से इसका सर्वत्र भ्रमण ही नहीं हो सकता ।
● यह तो पशु-पक्षियों का भी स्वभाव है कि जब कोई उनके घर आदि को छीन लेने की इच्छा करता है तब यथाशक्ति युद्ध करते अर्थात् लड़ते ही हैं ।
● ‘सभा’ शब्द का अर्थ है – जो सच-झूठ का निर्णय करने के लिए प्रकाश से सहित हो ।
● सब दिन वाणी से सत्य, प्रिय और मधुर बोलना चाहिए ।
● इस संसार में [एक गृहस्थ के लिए] अनुकूल स्त्री और पुरुष से होनेवाले सुख के सदृश दूसरा सुख कोई नहीं है ।
● माता-पिता की सेवा का त्याग किसी को कभी न करना चाहिए ।
● जो सच्चिदानन्द-स्वरूप और जिसके गुण, कर्म, स्वभाव सत्य ही हैं वह ‘ईश्वर’ कहाता है ।
● धर्म, श्रेष्ठ व्यवहार और परोपकार के साथ जिनसे जैसा व्यवहार करना योग्य हो वैसा ही उनसे वर्त्तना चाहिए ।
● वेदोक्त, न्यायानुकूल, पक्षपातरहित और जो पराया उपकार तथा सत्याचरणयुक्त है उसी को ‘धर्म’ जानना चाहिए ।
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