वर्ण व्यवस्था आश्रम प्रणाली जब तक ना अपनाओगे।

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वर्ण व्यवस्था आश्रम प्रणाली जब तक ना अपनाओगे।

वर्ण व्यवस्था आश्रम प्रणाली
जब तक ना अपनाओगे।
तब तक जीवन यात्रा का
आनन्द नहीं ले पाओगे।।
25 साल तक ब्रह्मचारी,
गुरूकुल में शिक्षा पाया करें।
25 साल गृहस्थ में रहकर
गृहस्थ के नियम निभाया करें।
वानप्रस्थ में 25 साल अपना
स्वाध्याय बढ़ाया करें।।

फिर लेकर सन्यास वेद का
सबको ज्ञान सुनाया करें।
इस जीवन की सीढ़ी पर तुम
जब तक ना चढ़ जाओगे तब तक ।।1।।

पढ़ना पढ़ाना यज्ञ करना
कराना दान का लेना देना
जिस के अन्दर यह गुण हों
ब्राह्मण उसे समझ लेना।
निर्बल सत्यवादी से डरें
बलवान दुष्ट को समझेना।।

क्षत्री का कर्तव्य यही है
देश धर्म पर दुख खेना।
नाम मात्र के ब्राह्मण क्षत्री
जब तक तुम कहलाओगे तबतक ।।2।।

वेदाध्ययन हवन सन्ध्या का
नित्यप्रति नियम निभाता हो।
पशु पालन कृषि के काम में
जो नित तत्पर पाता हो।।
निरन्तर जो व्यापार के द्वारा
ही जीविका चलाता हो ।
वक्त पड़े पर देश की सेवा
में सब द्रव्य गवाता हो।।
वैश्यों में वैश्यों के जब तक
यह गुण नहीं दर्शाओगे तब तक ।।3।।

पढ़ने लड़ने खेती बणजी में
जो पुरूष बेकार रहें।
तीन वर्ण की सेवा करना
धर्म है उनको शुद्र कहें।।

निज कर्तव्य पहचान उठें
सब फिर ना इतने कष्ट सहें।
तरह तरह की पार्टियों के
प्रवाह के अन्दर नहीं बढ़ें।
प्रेमी सुसंस्कारित जब तक
नहीं समाज बनाओगे बततक ।।4।।