वाणी से ही अमृत वर्षा
वाणी से ही अमृत वर्षा
वाणी में है कुटिलाई ।
सोच समझ मेरे भाई ।।टेक।।
मीठी वाणी मन भावे
और लगती सबको प्यारी है।
कड़वी वाणी दुख देती
घातक ज्यों तेज कटारी है।
यह तलवार दुधारी वाणी
बात समझ में अब आई ।
सोच समझ मेरे भाई ।।1।।
सीता जी ने वाणी से ही
लक्ष्मण के मन पाप कहा।
रही कैद में रावण के और
तरह-तरह का कष्ट सहा।
पश्चाताप रहा जीवन भर
घोर मुसीबत घिर आई।
सोच समझ मेरे भाई ।।2।।
इस वाणी से दुर्योधन की
हंसी उड़ाते पांडव जन।
जूए में सब हार गए और
फिरते थे बन बन निर्धन ।
जीवन चलना था मुश्किल
आफत सिर पर फिर छाई।
सोच समझ मेरे भाई ।।3।।
वाणी से ही मित्र बने और
वाणी देती आग लगा ।
वाणी दुखदाई हो मन के
देती सोते भाव जगा ।
दूर भगा देती है सबको
वाणी से हो निकटाई ।
सोच समझ मेरे भाई ।।4।।
कागा किसका धन हरता
और कोयल क्या दे जाती है ।
कर्कश वाणी बुरी लगे और
प्यारी मन को भाती है ।
खुशियां छाती है मनहर
जब सुंदर सी हो कविताई।
सोच समझ मेरे भाई।।5।।










