वैदिक वीरो सुभट कहाय
वैदिक वीरो सुभट कहाय,
उल्टी मत को मार भगा दो ॥ टेक ॥
अपना प्रेम-प्रताप पसार,
दुर्गुण-गढ़ में आग लगा दो ॥ १ ॥
गरजो ब्रह्मचर्य बल धार,
बाँधो पर हित के हथियार।
पटको घटियापन को दूर,
बढ़िया कुल की ज्योति जगादो ॥ २ ॥
भ्रम का नाश करो भरपूर,
छल को कर दो चकनाचूर।
अनुचित विषयों को संहार,
फिर आलस्य-असुर को मार।
कर लो उद्यम पै अधिकार,
उन्नति ठगियों को न ठगा दो ॥ ३ ॥
विचरो वैर विरोध विहाय,
सज्जन मण्डल को अपना।
सब से विरद बड़ाई पाय,
जग में ‘शङ्कर’ के गुण गा दो ॥ ४ ॥










