उठो आर्य वीरों, तुम जग को जगा दो।
उठो आर्य वीरों,
तुम जग को जगा दो।
इन वैदिक नादों को,
घर-घर गूंजा दो।।
प्रभु एक है,
और सभी नाम हैं गुणवाचक।
वही सृष्टि कर्त्ता, वही है पालक,
वही है विनाशक ।।
यदि चाहते हो,
विश्व को एक राह पर लाना।
तो अनेक काल्पनिक देवी-देवताओं को,
मन से भगा दो… (1)
उठो आर्य वीरों तुम जग को………
राम, कृष्ण, शिव ने भी था,
इसी को माना।
योग, साधना से,
इसे हृदय में था जाना।।
यदि चाहते हो महापुरुषों के,
चरित्र को अपनाना।
तो अवतारवाद के भ्रम को,
तुम जड़ से मिटा दो…. (2)
उठो आर्य वीरों तुम जग को……..
वेद ईश्वर की वाणी है,
ऋषि ने बताया,
उसकी होती नहीं प्रतिमा,
यह वेदों में दर्शाया,
यदि चाहते वेदों को,
विश्व भर में फैलाना
तो निराकार है ईश्वर,
यह सारे जग को जता दो….. (3)
उठो आर्य वीरों तुम जग को………
सन्ध्या, हवन है,
ईश्वर उपासना की रीति,
सदाचार, सद्व्यवहार और
परहित में हो प्रीति,
यदि चाहते हो ईश्वर प्राप्ति की,
एक पद्धति लाना
तो प्रभु पाने की सच्चा राह,
अष्टांग योग सब को बता दो (4)
उठो आर्य वीरों तुम जग को…………
ऋषि बोध दिवस ही नहीं,
वह जग कल्याण दिन था,
हुआ सत्य ज्ञान से प्रेरित,
ऋषि दयानन्द का मन था
यदि चाहते हो,
प्राणी मात्र को खुशहाल बनाना,
तो यही सत्य वेदों का ज्ञान,
जग के जन-जन को सुना दो (5)
उठो आर्य वीरों तुम जग को……..
आदमी एक पत्थर को काट कर उसे शक्ल देता है, फिर उसे अपना भगवान् मानता है, फिर उसी से डरता है, क्या यही पूजा है?










