उठ भोर भई, त्यागो निद्रा
उठ भोर भई, त्यागो निद्रा
अब ईश भजन की, बेला है
तू अपने प्रभु में, ध्यान लगा
जो सच्चा सखा , सहेला है
उठ भोर भई, त्यागो निद्रा
पशु जागे – पक्षी चेते हैं
गुण गान करें जगदीश्वर का
तू भी उठ जाग – प्रभु गुण गा
बना आलस का क्यों चेला है
उठ भोर भई, त्यागो निद्रा
“सेवक”, ऋषियों के सत्संग से
तू आत्मा अपनी शुद्ध बना
जप तप से जीवन को चमका
और झूठा छोड़ झमेला है
उठ भोर भई, त्यागो निद्रा
धन जन-बल तन ना साथ चले
शुभ-कर्म कमा इस चोले से
आया था अकेला दुनिया में
और जाना तुझे अकेला है
उठ भोर भई, त्यागो निद्रा
अब ईश भजन की, बेला है
तू अपने प्रभु में, ध्यान लगा
जो सच्चा सखा, सहेला है
उठ भोर भई, त्यागो निद्रा










