कर के देख लो
(तर्ज-या मेरी मन्जिल बता या ज़िन्दगी को छीन ले)
उस प्रभु के न्याय को स्वीकार कर के देख लो।
पाप के अञ्जाम से इक बार डर के देख लो।
उस प्रभु के न्याय को……
१. मन वचन से एक होकर बात कहना और से
ग़लत है या ठीक दिल पर हाथ धर के देख लो।
उस प्रभु के न्याय को……….
२. रंग लाती हैं दुआएँ धड़कनों से निकल कर
दीन दुःखियों बेबसों के कष्ट हर के देख लो।
उस प्रभु के न्याय को……….
३. गुज़रती है किस तरह से ज़िन्दगी मजबूर की
बेबसी के आंसुओं का घूंट भर के देख लो।
उस प्रभु के न्याय को………..
४. दिन सदा रहते नहीं हैं एक से इनसान के
श्वेत हो जाते हैं काले बाल सर के देख लो।
उस प्रभु के न्याय को……
५. जब उठाएँ एक उंगली दूसरों की ओर हम
तीन अपनी ओर ही झुकती हैं कर के देख लो।
उस प्रभु के न्याय को………..
६. ‘पथिक’ बेशक खूब करना गैर की आलोचना
मगर बन्धु दोष पहले अपने घर के देख लो।
उस प्रभु के न्याय को………..










