उपवन में आग लगी माली।।
उपवन में आग लगी माली।। टेक ।।
तू और किसी का नाम न धर।
अपराधी तेरे ही तरूवर,
आपस में जिन्होंने भिड़-भिड़ कर।
उपवन की चिता बना डाली ।।1।।
जो बन कारा में कैद बात,
सिसका करती थी दिवस रात।
हो मुक्त आज वह बनी हुई,
दावानल भड़काने वाली।।2 ||
तरू गुरू लघु ठुट हरित कुसुमित,
एकाकी लतीका आलिंगित।
चिर आश्रित पक्षी नीड़ सहित,
जल राख हुये जाते काली।।3।।
लघु नीर कलश क्यों रहा डाल,
अब शान्त न होगी काल ज्वाल।
चाहे तू कर दे धरती के सागर
नभ के बादल खाली।।4 ||
तज पगले हा हा कार रूदन,
जलने दे जीर्ण पुरातन बन।
इस पूर्ण दाह के बाद उगे,
नव वन की करना रखवाली।।5।।










