उपकार अनेक जगत पर कर गया एक ब्रह्मज्ञानी
उपकार अनेक जगत पर
कर गया एक ब्रह्मज्ञानी
कभी याद भी तुमको आती ?
ऋषिराज की अमर कहानी ।।
पश्चिमी सभ्यता के घन जब
उमड़-घुमड़ आते थे सब
रीति-नीति आर्यों के
आचार गिरे जाते थे।
किसने सिखलायी दुबारा
गायत्री की पवित्र वाणी….।।
अपने ही ग्रंथ पढ़ने के
हमसे अधिकार छिने थे
हाय! पवित्र आर्य जाति
के सोलह संस्कार छिने थे।
सत्यार्थ रच कर प्यारा दी
ये अनमोल निशानी…. ।।
उपकार जगत का करने
घर छोड़ चला ब्रह्मचारी
जगती के सुख-वैभव को
पल में थी ठोकर मारी
संकट से न घबराए दृढ़
व्रती यति लासानी….. ।।
धन्य रात वो शिव चौदस
की वो धन्य नगर टंकारा
जहां एक रात जगने से
बना जगत् जगावन हारा।
कहे वेग अमर कर जग
को खुद विष पी की कुर्बानी ।।










