उलझन में क्यूँ है मनवा

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उलझन में क्यूँ है मनवा

उलझन में क्यूँ है मनवा
तुझको ये क्या हुआ है
तू ढूँढता है जिसको
तुझमें ही वो छुपा है
उलझन में क्यूँ है मनवा

दिखती नहीं है लेकिन
अनुभव तो होती हर पल
फूलों में जैसी खुशबू
चलती हुई हवा है
तू ढूँढता है जिसको
तुझमें ही वो छुपा है
उलझन में क्यूँ है मनवा

मथुरा न काशी में वो
तीरथ न मन्दिरों में (1)
हर इक जगह पे वो है
कण कण में वो बसा है
तू ढूँढता है जिसको
तुझमें ही वो छुपा है
उलझन में क्यूँ है मनवा

कोई भी जाप कर ले (2)
कोई भी रूप धर ले
जिस हाल में भी है तू
तुझको वो देखता है
तू ढूँढता है जिसको
तुझमें ही वो छुपा है
उलझन में क्यूँ है मनवा

उलझन में क्यूँ है मनवा
तुझको ये क्या हुआ है
तू ढूँढता है जिसको
तुझमें ही वो छुपा है
उलझन में क्यूँ है मनवा
उलझन में क्यूँ है मनवा
उलझन में क्यूँ है मनवा